सागर। पद्माकर और डॉ. हरीसिंह गौर की नगरी सागर मेरे लिए पवित्र तीर्थ की तरह है। सागर के साहित्यकारों की आभा पूरे भारत में फैली हुई है। आजकल बढ़िया आदमियों की कमी होती जा रही है।
साहित्कार को लोभ से बचना चाहिए, क्योंकि मुद्राएं साहित्य से ऊपर नहीं हैं। यह उद्गार हिन्दी-उर्दू मजलिस के परिधि सम्मान समारोह में जबलपुर से आए डॉ. राजकुमार तिवारी ने अपने उद्बोधन में व्यक्त किए। कार्यक्रम में परिधि पत्रिका के विमोचन के बाद साहित्यकार आचार्य भगवत दुबे एवं डॉ.अजय जनमेजय को शाल, श्रीफल और प्रतीक चिन्ह प्रदान कर परिधि सम्मान से सम्मान किया गया।



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