रविवार, 16 दिसंबर 2012

रासायनिक पदार्थों से पकाए जा रहे मौसमी फल


बीना/ फलों के थोक व्यापारियों द्वारा फलों को पकाने विभिन्न रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल कर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। कृत्रिम तरीके से पकाए फ लों का सेवन कर लोग अनजाने में विभिन्न रोगों के शिकार हो रहे हैं।


ऐसा नहीं है कि खाद्द्दय एवं औषधि विभाग का अमला इस बात से वाकिफ नहीं है, विभाग की यह रहस्यमय चुप्पी लोगों में जनचर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि सेहत बनाने के उद्द्ददेश्य से फलों के साथ ही सब्जियों में पौष्टिद्दकता तलाशने वालों के लिए यह बुरी खबर है कि अब फलों एवं सब्जियों में विटामिन की बजाए जहर परोसा जा रहा है। जानकार बताते है कि फल व सब्जियों में विस्फोटक कार्यों में उपयोग किए जाने वाला कैल्शियम कारर्बाइड जैसा खतरनाक व ई थ्रेल क्रीबोन का उपयोग किया जाता है। 

मौसमी फल पकाने के लिए फ ल विक्रेताओं द्वारा जहरीले कीटनाशक पदार्थों का उपयोग फलों को पकाने में किया जा रहा है बहरहाल इस कड़वी सच्चाई से आम आदमी अनभिज्ञ है। उन्हें इस बात का पता नहीं है कि फ लों को पकाने में प्रयुक्त किए गए जहरीले पदार्थों का असर उनके स्वास्थ्य पर कितना पड़ रहा है। फलों व सब्जियों के गोदाम की बंद कोठरी में जहरीले पदार्थों का उपयोग थोक व्यापारी इसलिए करते हैैं कि वे जल्दी पक जाएं और उनका व्यवसाय दिन दूना और चौगना तरक्की करता रहे। जानकार बताते हैं कि फलों की कोठरी में व्यापारी कार्बाइड के टुकड़े या फिर केमिकल को अंदर रख देते हैं, जिससे निकलने वाली एसिटिलीन गैस व गंध की गर्मी से फल जल्दी पक जाते हैं। 

छींट वाले केले रोगों को दावत


नाम न छापने की शर्त पर एक थोक व्यापारी के यहां काम करने वाले युवक ने बताया कि इपी 50 नामक कीटनाशक के 100 एमएल की शीशी रखने से एक ट्रक केला दो दिन में खाने योग्य हो जाता है। यदि उसे छींठ वाला केला बनाना है तो पाँच दिन तक उक्त केले के ढेर पर रखनी पड़ती है। फलों में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशक के प्रयोग की जानकारी चाही गई तो वह साफ  मुकर गया। उसकी आढ़त में जहरीले रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता हैैकिसी दूसरी आढ़त में ऐसा होता हो तो उसे पता नहीं। 

इस तरह पकाए जाते हैं रसायनों से फल


सूत्रों ने फलों को जल्द पकाने की एक विधि और बताई कि एक बाल्टी पानी में आधा ढक्कन ई थ्रेल या ईपी 50 डालकर केला या अन्य फल को उस पानी में डुबाया जाता है, इसके बाद गीले कपड़े में ढंककर रख दिया जाता है। यह सिलसिला कोई आज का नहीं बल्कि वर्षों से चलता आ रहा है। केमिकल से फल पकाने में माहिर एक अन्य व्यवसायी ने दबी जुबान में बताया कि प्राकृतिक तौर पर फल देर से पकते हैं, इसलिए अगर वे कीटनाशक पद्घति का उपयोग नहीं करेंगे तो उनका व्यवसाय चौपट होने की कगार पर पहँुच जाएगा। जिसके लिए खाद्द्दय एवं औषधि विभाग के अफसरों को एक मुश्त कमीशन दिया जाता है ताकि उनकी आढ़त छापे एवं अन्य वैद्यानिक कार्रवाईयों से मुक्त रह सके। इस संबंध में जब डॉ. मानिकचंद मेघवानी से बात की तो उन्होंने बताया कि रासायनिक पदार्थों से पकाई जाने वाली सब्जी या फल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...