सागर। सांसद भूपेन्द्र सिंह ने बुन्देली भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए अशासकीय विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया है। सांसद श्री सिंह इसके पूर्व भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, सूचना का अधिकार अधिनियम और मनरेगा अधिनियम में संशोधन कराने के लिए तीन अशासकीय विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत कर चुके हैं।
इस शीतकालीन सत्र में शुक्रवार 7 दिसम्बर को संसद की कार्रवाई में बुन्देली भाषा सहित चारों विधेयक पुरस्थापित करने हेतु शामिल किए गए हैं। बुन्देली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने हेतु प्रस्तुत विधेयक में सांसद भूपेन्द्र सिंह ने बताया है कि भारत एक बहुभाषी देश है और संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता दी गई है।
ये भाषाएँ क्षेत्र विशेष की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह दुर्भाग्य है कि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बुन्देलखंड क्षेत्र में करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली बुन्देली भाषा को अभी तक संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। विधेयक में लेख है कि किसी भी समाज या देश का वैभव उसकी भाषा में रचे गए साहित्य से पहचाना जाता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए, बुन्देली भाषा के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो महाकवि जगनिक द्वारा लिखा गया महाकाव्य आल्हखंड बुन्देली में ही लिखा गया था। तात्पर्य यह है कि बुन्देली भाषा बोलचाल और लेखन में दो हजार वर्ष पहले भी थी। तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस बुंदेली शब्दों से भरी हुई है।
सागर, जबलपुर, ग्वालियर, होशंगाबाद और भोपाल संभाग सहित उत्तरप्रदेश के सीमावर्ती जिलों में करीब 187934 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बुंदेली भाषा बोलने वालों की संख्या वर्तमान में लगभग 5 करोड़ है। इसी वर्ष 24 फरवरी 2012 को मध्यप्रदेश विधानसभा ने सर्व सम्मति से अशासकीय संकल्प पारित कर बुंदेली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध भारत सरकार को भेजा है। अत: वृहद भूभाग में फै ले बुन्देलखंड क्षेत्र की जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बुन्देली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान करना चाहिए।



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