रविवार, 23 दिसंबर 2012

न्यायाधीशों के लिए तीन दिवसीय विशिष्ट प्रशिक्षण

सागर। राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला के सभागार में आयोजित की जा रहे तीन दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान दूसरे दिन न्यायाधीशों को घटनास्थलों की वैज्ञानिक जांच कर मामलों को सुलझाने की वैज्ञानिक विधि बताई गई और उनको डिमास्ट्रेशन करके दिखाएं गए। 

राज्य न्यायालिक विज्ञान प्रयोगशाला , सागर न्यायालिक अधिकारी प्रशिक्षण संस्थान और मप्र उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा आयोजित किए जा रहे प्रशिक्षण शिविर के दौरान एफएसएल के वैज्ञानिकों ने न्यायिक व्यवस्था में फोरेंसिक विज्ञान की भूमिका विषय पर 38 न्यायाधीशों को वैज्ञानिक विधि बताई। इस दौरान ग्वालियर से आएं वैज्ञानिक डॉ. पीके दुबे ने न्यायाधीशों को बताया कि अगर किसी के साथ वारदात हो जाएं तो उस मामले को सुलझाने के लिए फोरेंसिक साइंस का सहारा लेना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि आत्महत्या, पानी में डूब कर मर जाना, कत्ल हो जाना आदि मामलो में शव का परीक्षण कर वैज्ञानिक आधार पर सही निर्णय लिया जा सकता है,कि वास्तव में ये घटनाएं कैसे और क्यों घटित हुई। वैज्ञानिक विधि से अनसुलझे रहस्य भी सामने आ जाते हैं।

डॉ. स्वाति श्रीवास्तव ने नारकोटिक्स और कैमेस्ट्री के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि आगजनी के प्रकरण में अक्सर यह समझ नहीं आ पाता कि घटना को अंजाम किस रसायन या फिर किस पदार्थ से दिया गया है। ऐसे पदार्थों का परीक्षण करके इस मामले का निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है। इससे यह भी पता चल जाता है कि घटना को अंजाम कब और कैसे दिया गया है।  इस दौरान उन्होंने गांजा, अफीम आदि मामलों में भी फोरेसिंक साइंस की रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लेने की बात कही। प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, सागर, दमोह, सहित मप्र से 38 न्यायाधीश आएं हैं, जिनको यहां विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

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