सोमवार, 21 जनवरी 2013

असंयमी कभी धार्मिक नहीं होते


सागर/ ग्राम ढाना में दीपक तिवारी के निवास पर आयोजित सप्त दिवसीय रामकथा जानकी प्रसंग के द्वितीय दिवस कथा में वृंदावन धाम से पधारे अष्टादश पुराण के ज्ञाता आचार्य पं. बृजपाल शुक्ल ने धर्म और संयम इन दो शब्दों में धर्म साधन है और संयम धर्म का फल है। फल प्राप्त न होने पर क्रिया में न्यूनता समझी जाती है।


बड़े भाग्य से मनुष्य जन्म मिलता है, किन्तु धर्म के आचरण में भाग्य नहीं माना जाता। जो मनुष्य अधर्म का आचरण कर सकता है, वही मनुष्य धर्म का भी आचरण कर सकता है। आचरण करने से भाग्य बनता है। भाग्य में आचरण नहीं लिखा होता। धर्म भावहीन नहीं होता, धर्म सदा भावना प्रधान होता है। श्रीरामचरितमानस में धर्म का पूर्ण आचरण महाराज दशरथ जी के वंशधरों ने ही किया है। धर्म के आचरण के लिए बुद्धि में विवेक और ज्ञान दोनों आवश्यक है। 

विवेकहीन धार्मिक क्रियाओं का आचरण करने वाला मनुष्य धार्मिक नहीं कहलाता, अपितु धार्मिक क्रियाओं का आचरण करने से विवेकहीनता नष्ट होती है। मोहग्रस्त मनुष्य के सामने संसार में विपत्तियों का जाल होता ही है। ऐसे मोही मनुष्य विपत्ति आने पर धर्म का त्याग कर देते हैं। शुद्ध से अशुद्ध हो जाते हैं, अपनी जाति और गुण दोनों का विनाश करके दुष्टों के अधीन हो जाते हैं, इसीलिए कहा जाता है कि धर्म से वीरता आती है, कायरता नहीं।  

जो अपनी इच्छा और शक्ति के अनुसार आचरण किया जाए उसे धर्म   नहीं कहते अपितु अपनी सम्पूर्ण शक्ति से भौतिक सुखों की प्रबल इच्छा को दमन करके आत्म कल्याण तथा जीवों के कल्याण के लिए किया गया आचरण धर्म कहलाता है, फिर भले ही थोड़े समय के लिए जीवन जिया जाए। कथा में सत्यदेव कटारे पूर्व ग्रहमंत्री, भोपाल से आए रवीन्द्र पंड्या, श्याम अवस्थी, माधो सिंह पटेल, मुकुल पुरोहित, जीके दुबे प्राचार्य ढाना कालेज सहित भारी संख्या में श्रृद्धालू, श्रोतागणों ने कथा का आनंद लिया। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...