बीना। ग्राम बेलई की एक 16 वर्षीय लड़की जन्म से विकलांग है जिसेआज तक ट्रायसाईकिल नसीब नहीं हुई है। उसका बूढ़े पिता उसे कंधे पर लेकर सरकारी अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कार काटता है। विकलांगता पर मिलने वाली पेंशन भी नसीब नहीं हो पा रही है। आठवीं पास करने के बाद उसकी पढ़ाई पर भी विराम लग गया है। जबकि वह अभी और पढ़ने का सपना आंखों में संजोए हुए है।
18 वर्षीय माया अहिरवार के साथ जन्म से ही प्रकृति ने न्याय नहीं किया वह चलने फिरने के लिए आज तक दूसरों पर ही निर्भर है। इसके बाद भी उसने जिंदगी से हार नहीं मानी और गांव के स्कूल से किसी तरह आठवीं पास कर ली। परिजनों ने उसकी मंशा का सम्मान करते हुए आगे पढ़ने में भी कदम नहीं हटाए और भानगढ़ के सरकारी छात्रावास में उसका नाम लिखवा दिया। लेकिन उसकी विकलांगता को देखते हुए प्रबंधन ने उसे वहां रखने से इंकार कर दिया। अन्य सरकारी स्कूलों से भी मदद और प्रोत्साहन न मिलने के कारण वह पिछले दो वर्षों से मन संजोए कर घर में बैठी हुई है।
जवान बेटी को बूढ़ा पिता कंधों पर लेकर घूमता फिरता है। अन्य परिजन भी 16 साल से इसी तरह परेशानियां उठाकर पाल रहे हैं। वह आठवीं कक्षा तक कैसे रोज स्कूल पहुंचती होगी और फिर कैसे घर वापिस आती होगी यह सोचकर भले ही लोगों को कलेजा भर आए लेकिन जनप्रतिनधियों एवं अधिकारियों की आंखों में शर्म नहीं आई। उसे आज तक ट्राय साईकिल, व्हील चेयर एवं अन्य जरूरी उपकरण नहीं दिए गए हैं। पंचायत की तरफ से दी जाने वाली पेंशन भी उसे उपलब्ध नहीं कराई जाती।
माया के पिता चतरे अहिरवार ने बताया कि वह सरपंच, सचिव एवं अन्य अधिकारियों के पास जा-जाकर थक गए लेकिन किसी ने मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। पंचायत वाले आवेदन लेने तैयार नहीं होते। उसका मन भी पढ़ने को करता है हम भी चाहते हैं कि वह पढ़लिखकर लायक बन जाए। ताकि वह आर्थिक रूप से निर्भर होकर अच्छा जीवन जी सके।
माया के पिता चतरे अहिरवार ने बताया कि वह सरपंच, सचिव एवं अन्य अधिकारियों के पास जा-जाकर थक गए लेकिन किसी ने मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। पंचायत वाले आवेदन लेने तैयार नहीं होते। उसका मन भी पढ़ने को करता है हम भी चाहते हैं कि वह पढ़लिखकर लायक बन जाए। ताकि वह आर्थिक रूप से निर्भर होकर अच्छा जीवन जी सके।



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