सागर। डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के विधि सेल द्वारा अधिवक्ता शुल्क के नाम पर जिन बिलों के आधार पर भुगतान किया गया है उनमें अधिकांश बिल अस्पष्ट हैं। विगत ढाई वर्षों में 37 लाख रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है।
यह आरोप आम आदमी पार्टी ने शुक्रवार को प्रेस कान्फ्रेंस कर विश्वविद्यालय पर लगाए हैं। उन्होंने कहा कि जिन बिलों के आधार पर भुगतान किया है उन अधिकांश बिलों में यह नहीं दर्शाया गया है कि मांगा गया शुल्क किस कार्य अथवा कितने कार्य के लिए मांगा गया है। जिससे 37 लाख रुपए के घोटाले की संभावना है।
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के विरूद्ध एवं पक्ष में उच्च न्यायालय जबलपुर में विचाराधीन एवं निर्णीत प्रकरणों में अधिवक्ताओं को जो शुल्क भुगतान किया है उसमें एकीकृत नियमावली का पालन नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि एनएस गजभिए द्वारा विश्वविद्यालय के कुलपति का पद ग्रहण करने के बाद यह अनियमितताएं शुरु हुई हैं।
श्री गजभिए के कुलपति बनने के बाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन प्रकरणों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। सन 2009 तक उच्च न्यायालय में विचाराधीन प्रकरणों की संख्या 33 थी वहीं वर्ष 2012 में यह बढ़कर 166 हो गई है। जिससे स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय में अनियमितताएं और भ्रष्टाचार व्याप्त है।
अधिवक्ता शुल्क भुगतान बिलों से स्पष्ट होता है कि उच्च न्यायालय जबलपुर के अधिवक्ता श्रीमती शोभा मेनन द्वारा विश्वविद्यालय की तरफ से पैरवी के एवज में जो बिल शुल्क भुगतान हेतु प्रस्तुत किए गए उसमें अधिकांश बिल त्रुटीपूर्ण एवं संदेहास्पद है।
उन्होंने कहा कि लीगल सेल के प्रभारी सतीश कुमार, तत्कालीन वित्ताधिकारी जेके जैन, रजिस्टार एवं कुलपति एनएस गजभिए विश्वविद्यालय के धन का दुरुपयोग देखकर भी मौन हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रकरणों में पक्षकारों के अस्पष्ट नाम, प्रकरण क्रमांक, बिलों में अंकित बिना बिलों का भुगतान कर दिया गया। श्रीमती शोभा मेनन द्वारा प्रस्तुत कुछ बिल ऐसे भी हैं जिसमें प्रकरण क्रमांक अंकित नहीं है, है तो अस्पष्ट है। पक्षकारों के नाम पूर्ण नहीं है। उसके बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बिल का भुगतान कर दिया गया।
एएपी ने उठाए प्रश्न
आम आदमी पार्टी संयोजक अतुल मिश्रा एवं सचिव धर्णेन्द जैन ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से सवाल किए हैं कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन को मालूम है कि किस कार्य हेतु अधिवक्ता शुल्क का भुगतान किया गया। अधिकांश प्रकरण श्रीमती मेनन को ही पैरवी के लिए क्यों दिए गए। क्या विवि प्रशासन द्वारा अधिवक्ताओं को शुल्क प्रदान करने कोई गाइडलाइन या नियमावली नहीं है। क्या विवि प्रशासन अधिवक्ता जो मांग रखता है उसी के अनुसार भुगतान करता है। प्रकरणों के विचाराधीन होने पर भी क्या अधिवक्ता को फीस अदा की जाती है। विवि प्रशासन का यह कर्तव्य नहीं है कि संबंधित अधिवक्ता से यह जाने कि उसने संबंधित प्रकरण में कोर्ट में कौन सा कार्य किया जिसकी वह फीस मांग रहा है।




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