सागर। बाहर से लोग बहुत मुस्कुराते हैं, परंतु अंदर से चिंताए बनी रहती है। भगवान की नासा दृष्टि है, क्योंकि उन्हें न कोई चाह है और न ही कोई परवाह है। लेकिन हम आज और कल की चिंता में लगे हुए हैं। यह शब्द नए वर्ष के पहले दिन मोराजी में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य मुनि श्री अजित सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहे।
मुनि श्री ने कहा कि काल के रहस्य को समझना चाहिए कि वह दिन पर दिन बड़ा हो रहा है और आचरण दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है। ज्यादा पैसा बढ़ने से विनाश भी बढ़ने लगा है। आवश्यकता से ज्यादा रखना परिग्रह है। जैन वह है जो जिनेन्द्र के कहे अनुसार चले। पैसे से पाप कर सकते हैं, पुण्य तो बिरले ही कर पाते हैं। जो अपने कुल की परंपरा चलाते हैं, वे ही जैन हैं।
मुनि श्री विषद सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित किया। प्रवचन के पूर्व शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य प्रमोद, महेश बिलहरा, देवेन्द्र जैन, श्रीमती नीता जैन को मिला। इस अवसर पर डॉ. जीवनलाल जैन, प्रकाश, संतोष, कंछेदी दाउ, मुकेश जैन ढाना, राजकुमार, राजेन्द्र, शीतल जैन, अशफीर्लाल जैन, ऋषभ, संजय आदि सहित बडी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।



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