खुरई। खुरई तहसीलदार दिनेश शुक्ला उस समय सकते में आ गए जब उन्होंने स्वयं के पीने के लिए पानी की बाटल तहसील कर्मचारी काशीराम पटेल से मंगवाई। वह तहसील के सामने टिकलू टी स्टाल से एक बूंद कंपनी की मिनरल वाटर की बाटल ले आया और पाया कि उसमें पानी शैवाल भरा मटमैला गंदा है।
दूसरी बार पानी की बाटल मंगवाने पर दूसरी बाटल उससे भी खराब स्थिति में थी उसमें और भी ज्यादा शैवाल और गंदा पानी था। काशीराम पटेल ने बताया कि पानी की बाटलें देखने से एैसा लग रहा था मानो किसी तालाब का गंदा पानी बाटलों में भरा हो। अपना आपा खोए तहसीलदार ने दुकान पर जाकर कार्रवाई करते हुए पानी की और बाटलें जांच की तो शेष बची एक बाटल में भी काई थी।
सभी तीनों बाटलें बूंद कंपनी की हैं और सागर स्थित प्लांट में बनी बताई जा रहीं है। ये सभी बाटलें 25 दिसम्बर 2012 की पैकिंग की हैं। पटवारी अशोक जैन से पंचनामा बनवाकर तीनों पानी की बाटलें जब्त कर लीं और आगे की कार्रवाई के लिए ड्रग निरीक्षक को संपर्क कर आगे की कार्रवाई की बात की है।
इनका कहना है
मैं तहसील में निर्माण कार्य करवा रहा था। प्यास लगी तो पानी की बाटल मंगवाई तो बंूद कंपनी की बाटल में काई निकली उसके बाद दुबारा बाटल मंगवाई तो उसमें और भी ज्यादा काई निकली दोनों बाटलों में पानी मटमैला था। दुकान से बूंद कंपनी की तीन पेक बाटल जब्त कीं है। खाद्य विभाग की टीम आकर जांच करेगी।
दिनेश शुक्ला, तहसीलदार खुरई
--------------
क्या होते हैं शैवाल
शैवाल प्राय: पर्णहरित युक्त, संवहन ऊतक रहित, आत्मपोषी तथा सेल्यूलोज भित्ति वाले पौधे होते हैं। इनका शरीर सूकाय के समान होता है, अर्थात् जड़, तना एवं पत्तियों में विभक्त नहीं होता है। शैवाल एक जलीय पौधा है, जो समुद्र में उगता है। कुछ शैवाल अन्य पौधों की जड़ों में भी रहते हैं, जैसे- साइकस की जड़ों में 'एनाबीना' तथा एन्थोसिरोस में 'नोस्टॉक' वास करते हैं। कुछ शैवाल कवकों के साथ मिलकर सहवास करते हैं, जिन्हें लाइकेन कहा जाता है। शैवालों के अध्ययन को 'फ़ाइकोलॉजी' कहते हैं। शैवालों का प्रयोग आज लगभग हर क्षेत्र में होने लगा है। इनका प्रयोग भोजन के रूप में, औषधि निर्माण में, विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक कार्यों आदि में किया जाता है। जहाँ कुछ शैवाल मानव के लिये लाभदायक हैं, वहीं कुछ शैवाल मानव तथा दूसरे जीवों के लिए हानिकारक भी होते हैं।
विभाजन
शैवालों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
रोडोफाइटा या लाल शैवाल - यह एक समुद्री शैवाल है। ये अपनी भित्ति पर कैल्शियम का स्राव तथा संचय करते हैं। इसका लाल रंग फाइकोएस्थिरिन तथा फाइकोसायरिन (फाइकोवायलिन) वर्णकों के कारण होता है।
फियोफाइटा या भूरा शैवाल - ये शैवाल अधिकांशत: समुद्र में पाए जाते हैं। भूरे शैवाल में फ्यूकोजैनथिन तथा क्लोरोफिल नामक वर्णक उपस्थित होते हैं। इस प्रकार के शैवाल से आयोडीन प्राप्त किया जाता है।
क्लोरोफाइटा या हरा शैवाल - हरे शैवाल विभिन्न माप तथा आकार के होते हैं। कुछ हरे शैवाल एककोशिकीय तथा सूक्ष्मदर्शी होते हैं। हरे शैवाल में क्लोरोफिल ‘ए’ तथा क्लोरोफिल ‘बी’ और कुछ वैरोटिनाइड पाया जाता है।
आवास
शैवाल ताज़े जल, समुद्री जल, गर्म जल के झरनों, कीचड़ में तथा नदी, तालाबों आदि में वास करते हैं। कुछ जलीय शैवाल, जैसे- ओडोगोनियम, स्पाइरोगाइरा, कारा आदि हैं। बर्फ़ पर पाये जाने वाले शैवाल को 'क्रिप्टोफाइट्स' कहते हैं। कुछ शैवालों में गति करने के लिए 'फ्लेजेल' पाए जाते हैं।
हानिकारक शैवाल
कुछ शैवाल जलाशयों में प्रदूषण बढ़ाते हैं, जिससे पानी प्रयोग के योग्य नहीं रह जाता है। ये शैवाल ज़हर पैदा करते हैं, जिससे मछलियाँ मर जाती हैं और नदियों आदि का प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। इस तरह की शैवालों में माइक्रोसिस्टिस, क्रोकोकस तथा ओस्सिल्लेरिया आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
सिफेल्यूरोस नामक शैवाल की जातियाँ चाय पर ‘लाल किट्ट रोग’ (Red rust of Tea) उत्पन्न करती हैं, जिससे चाय उद्योग को भारी हानि पहुँचती है।
बरसात के दिनों में ज़मीन हरे रंग की दिखने लगती है और फिसलनदार हो जाती है। इस ज़मीन में हरित-नीले शैवाल उग आते हैं, जिसके कारण ऐसा होता है।
कुछ अन्य विशेषताएँ
ट्राइकोडेस्मियम इरीथीयम नामक हरी-नीली शैवाल लाल सागर में जल के ऊपर तैरती है और यह सागर को लाल रंग प्रदान करती है। इसी कारण से सागर को लाल सागर (Red sea) कहते है।
एसिटाबुलेरिया सबसे छोटा एककोशिकीय शैवाल है, जिसकी लम्बाई 6 से 10 सेमी. होती है।
मैक्रोसिस्टिस सबसे बड़ा शैवाल है। इसकी लम्बाई लगभग 50 मीटर होती है। इसी कारण से इसे ‘दैत्याकार समुद्री घास’ कहा जाता है।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले शैवाल सामान्य रूप से धान के खेतों में पाये जाते हैं।
सबसे छोटा क्रोमोसोम (गुणसूत्र) शैवाल का होता है।
चट्टानों पर उगने वाले शैवालों को ‘लीथोफाइट्स’ कहते हैं।




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें